मोदी सरकार का काले धन पर अच्छा फैसला, आगे का भी करें ख़्याल।

भेड़चाल, इंसानों की...
भेड़चाल, इंसानों की…

 

ये तो बहुत अच्छा हुआ कि बगैर किसी को बताए पांच सौ व हज़ार के नोट एकदम से बंद हो गए।

पैसों के प्रति भारतीयों का रवैया बहुत ही निम्न वर्गीय रहा है। पैसों को इंसानों से ज़्यादा तवज्जो दी जाती रही है, उसकी भरपूर इज़्ज़त की जाती है और उसी के बल पर लोगों की छातियाँ फूलती व इतराती हैं। ज़ाहिर सी बात है ऐसे हालातों में अमीरों को महत्त्वपूर्ण समझा जाता है, उन्हीं की पूछ होती है, उन्हें ख़ासमखास दर्जा दिया जाता है। ये सिर्फ़ यहाँ नहीं बल्कि सारे संसार में होता चला आ रहा है।

पैसा सब कुछ कर दिखलाता है।

पैसों के लिए लोग क्या-कुछ नहीं कर जाते।

सफ़लता को पैसौं में तोला जाता है। और पैसा ही एक ऐसी चीज़ है जो सभी कार्यों की एवज में लिया या दिया जाता है।

गरीबी बिना अमीरी के पैदा नहीं हो सकती। जब तक देश में अमीर लोग हैं तब तक गरीब लोग भी रहेंगे। जब तक पैसे पर अत्यधिक ध्यान दिया जाएगा समाज में इसके प्रति लोग असाधारण रूप से आकर्षित रहेंगे व जिसके पास दिमागी ताक़त, रुतबा, संसाधन व स्वयं अपने लिए सोचने वाली मानसिकता है इसके लिए जद्दोजहद चलती रहेगी। किसी के पास बहुत होगा तो किसी के पास पानी खरीदने ले लिए भी नहीं।

पैसा बहुत हद तक एक विचार बन जाता है जिसके बल पर हम दिमागी और मानसिक खेल खेलते हैं और उसी को जीवन जीना मान चुके हैं। पैसा बनाती भी सरकार ही है, तो सरकार भोली तो नहीं और न ही दोषमुक्त है। सरकार चाहती है सब उसके कहे पर जिएँ, खाँए, उठे, बैठें। कंपनियाँ चाहती हैं उनके ज़्यादा से ज़्यादा पैसा बनें, व्यक्ति चाहते हैं वे सबसे अमीर बनें, महँगी से महँगी गाड़िया, बंगले, सोना-जवाहरात खरीदें। बॉलीवुड की फिल्में यही दिखाती हैं, और वहाँ के अभिनेता अपनी असल ज़िंदगी में भी यही।

सफ़लता=रुतबा=अच्छी ज़िंदगी=निजी संतुष्टता=मानसिक शांति=निर्वाण=जन्नत=बेहतरीन खान-पान=धन 

मीडिया, अख़बार, ये सब भी कंपनियाँ हैं। बरखा दत्त या रविश कुमार जैसे अपने आपको मूल्य-आधारित रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार भी बड़ी-बड़ी तनख़्वाहें, कंपनी में शेयर कमा रहे हैं, और जन-साधारण से कई गुना ज़्यादा, और फिर उसी जन-साधारण को सिखा रहे हैं सच और झूठ में कैसे फ़र्क करना।

अभिनेता, क्रिक्रेटर, नेता, फिल्म निर्देशक, धर्म गुरु, साधु-संत सब मूल्य सिखा रहे हैं, बताते हैं कैसे अच्छे से रहना चाहिए, क्या करना चाहिए क्या नहीं, कौन-सा पानी पीना चाहिए, क्या खाना चाहिए, कैसे प्रेम करना चाहिए, कैसे सफ़ाई रखनी चाहिए… ऐसे जैसे कि वो बहुत पाक़-साफ़ लोग हैं, जैसे कि एक निश्चित मुक़ाम पर पहुँचने के बाद उनके यहाँ सब बढ़िया हो चला है, कि उन्होंने असली जीवन हासिल कर लिया है।

सब झूठ है। बक़वास कहा जा सकता है इसको।

इन्हीं की वजह से लोग अशांत हैं, उन्हें वो जीवन प्राप्त करने के लिए उकसाया जाता है, भड़काया जाता है।

हिंदु को बोला जाता है मुसलमान ख़राब है और मुसलमान को बोला जाता है हिंदु ख़राब है। बोलता है वो जो सफ़ल हो चुका है, जिसे पर्याप्त धन व रुतबा मिल चुका होता है, जो अपने अवचेतन से ही सब कुछ कर रहा होता है, जो आप और हम में से निकला होता है, हमारे जैसा ही है, निष्चेत है।

पांच सौ व हज़ार के नोट जो बंद हुए, क्या लोगों के डर भी ख़त्म होंगे? क्या लोग इस सरकार या आने वाली सरकारों से डरना बंद कर देंगे? क्या लोग अपने घरों, लॉकरों, तिजोरियों में सोना, चांदी, अन्य कीमती चीज़ों को छिपाना छोड़ देंगे? क्या वो विदेशों में बेनामी जायदाद व पैसा रखना छोड़ देंगे? क्या वो असुरक्षित नहीं रहेंगे? क्या उनमें सुरक्षा की भावना जन्म लेगी? क्या हमें लगने लगेगा कि शायद इंसानों से डरने की कोई भी ज़रूरत नहीं?

इन सवालों के उत्तर नहीं।

ख़ुद हम अपने-आप से ये सवाल करें तो शायद हमें कुछ प्रकाश दिखाई पड़े।

बहरहाल ये नोट बंद होंगे तो वो जमा हुआ पैसा सामने आएगा जिसपर सरकार को कर नहीं चुकाया गया। संभवत: सरकार अमीर हो जाएगी, सफ़ल हो जाएगी, और जनता व समाज का अधिक प्रभावी रूप से नियंत्रण कर पाएगी। उसके पास और शक्ति आ जाएगी, और पहुँच।

अनुभव कहता है कि जितना कोई शक्तिशाली बनता है, जितना कोई प्रभाशाली, रसूख़दार बनता है उतना ही संभावना बढ़ती है उसके गिरने की, उसमें दरारें पड़ने की, उसमें भ्रष्ट आचरण की, क्योंकि समाज तो एक झटके में नहीं बदलते व न ही बदलते दिख पड़ रहे हैं। नया पुराना बनता है और पुराना बाहिर होता है।

फिर चाहे शक्ति किसी के पास भी आए, किसी व्यक्ति, समाज, देश, सरकार या फिर कंपनी ही।

ध्यान देना व ध्यान रखना।

 

 

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बड़बोला

हिंदी लेखक, www.iqbalchoudhary.net पर अधिक जानकारी।

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