नासमझी का हदें

वाह रे भारत सरकार, अपना पैसा, अपना बैंक और अपनी ही लंबी कतार!

 

आज के राजनीतिज्ञों ने जो हालात पैदा करे हैं उनसे भारत क्या कभी उबर पाएगा? सिर्फ़ ख़्याली ताक़त के भरोसे जमा-जमाया ढर्रा तोड़ा, कोई भी काम नीतिगत नहीं किया। गरीबों को सताया, ईमानदार अमीरों को परेशान किया, मध्य वर्ग में खलबली पैदा की, अपने काम को ठीक से दिमाग लगाकर नहीं किया और अपरिपक्वता से सब संयोजन हुआ। हमारी ही चाय पी और प्लेट भी हमारे सिर पर तोड़ी! नागरिकों के बीच फूट डाली, ये गंदा है, वो गलत है, वो जो उधर दूर बैठा है, जो काले धन के ढेर पर बैठा बांसुरी बजा रहा है, उसने ही सारी शरारत की है…

कोई तरीका होता है काम करने का, चीज़ों को समझने का, बूझने का। इतना विशाल देश, इतना बड़ा जन-समूह, इतनी विकराल इतिहास। कहीं से कुछ सीखा? कहीं से कुछ जाना?

पश्चिमी देश बनाना है, डिजिटल करना है, तरक्की करनी है, विश्व में पहला राष्ट्र बनाना है। अरे भैया जनता की अर्थियों पर बैठकर तरक्की करोगे? मासूमों के उजड़े भविष्य को बरबाद करोगे? आपके चक्कर में रहे तो हो चला विकास, फिर तो एक-दूसरे की मार-काट होगी, बस।

ये है क्या, एक हीन भावना से ओत-प्रोत विकास? सच में ही नाम बड़े और दर्शन बड़़े ही छोटे!

और देश में बाकी सब वैसे का वैसा। भ्रष्ट राजनीति चल रही है, रोज़ बलात्कार हो रहे हैं, सत्ता का भरपूर दुरुपयोग हो रहा है, जल्द ख़राब होने वाली बेकार सड़कें बनायी जा रही हैं, अफसरों की तनख्वाहें बढ़ाई जा रही हैं, सांसदों को रोज़ नये खर्चे करने के अधिकार दिए जा रहे हैं, हर दिन ख़ून, चोरियां, डकैतियाँ, धोखाघड़ी हो रही है, पुलिस, रिज़र्व बैंक, कंपनियाँ, सहकारी बैंक, सरकारी बैंक, निजी बैंक, सब भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। डिजिटल के नाम पर बाकि सब जगह घोर अंधकार।

अपने सरकारी अफसरों को तो पहले सुधारो, अपनी पुलिस, अपने आयकर कर्मचारियों, अपने बैंकों पर तो आंख रखो।

वहाँ कश्मीर में सैनिक मरते जाते हैं, कश्मीरी समाज का भविष्य अंधकार में डूबा है,  वहाँ भी कोई निजात नहीं दुखों से। वहाँ क्या किया आपने? कौन-से झंडे गाड़े?

जब तक देश में एक भी बच्चा भूख से मरता है, पांच साल से भी कम उम्र में काम पर लग जाता है, और जीवन भर अपने हालात और देश के भ्रष्टाचारी नेताओं, उद्योगपतियों व हुक़्मरानों के बनाए नियम-क़ानून पर घिसते-घिसटते थक-हार के एक दिन, वक़्त से बहुत पहले ही दुनिया छोड़ देता है तब तक न तो आप विकास कर रहे हैं, न आप काला धन वापस ला रहे हैं और नही ही आप डिजिटल क्रांति ला रहे हैं। आप फंतासी में जी रहे हैं, आप भ्रांतियाँ पाले बैठे हैं। आप अपनी आँखें मूंदकर बैठे हैं जबकि ख़तरा आपके सामने खड़ा है, आपको लगा रहा है कि आँख मूंदकर आप बच जाएँगे? उस बच्चे के साथ आप भी ख़त्म हो जाएँगे।

चाहे आप कहें कि भारत में  बीएमडब्ल्यू् कारों की सारे संसार में सर्वाधिक बिक्री हो रही है, या फिर ये कि भारत का विकास दर संसार में सबसे आगे है, या फिर ये कि भारत में अरबपतियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, या फिर ये कि भारत का मुम्बई फिल्म उद्योग विकास की पराकाष्ठा छू रहा है। ये सब झूठ है, असत्य है। आप देख नहीं रहे हैं कि आस-पास लोग दुखी हैं, पीड़ित हैं, लाचार हैं। असली भारत दुखदायक है, वो कोई सोने की चिड़िया नहीं या सोने की चिड़िया बनने वाली राह पर भी बिल्कुल नहीं। आँखें खोलिए।

बड़े-बड़े उद्योगपति कहते हैं वाह, रे वाह देश बदल रहा है। नेता, अभिनेता, सभी देश के असली दावेदार, वारिस वाहवाही कर रहे है। सरकार अपना ही परचम उंचा फहरा रही है। अपने मुँह ही मियाँ-मिट्ठू! कोई नहीं देखता कि आला, मध्य व निम्न, सारे दर्जों के निक्कमे राजनीतिज्ञ, अफसर व प्रशासनिक अधिकारी कुछ भी नहीं कर रहे है, किसी भी काम को ठीक से अंजाम नहीं दे पा रहे हैं। या कोई भी नहीं देखना चाहता, चाहकर भी।

कुछ बोलेंगे आप उन करोड़ों रुपयों पर जो हवाई-अड्डों, रेलवे स्टेशनों, गाड़ियों, कारों, घरों, तिजोरियों, लाकरों में, राजनीतिज्ञों, नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, उद्योगपतियों, बिचौलियों, बड़े लोगों के पास से मिल रहे हैं?

ये तो जो मिल रहे हैं, उनका क्या जो सहकारी बैंकों में, जन-धन में, जनता के खाली पड़े खातों में और अब लोगों के घरों तक में नए नोटों के रूप में पहुँच चुके हैं?

है कोई नई सोच जो इसका रास्ता बताएगी?

या फिर वही पुराने चुनावी दाव-पेंच हैं ये सब? हमारे ऊपर बात न टालना, नहीं बिल्कुल नहीं। आपको चुना, सर्व-सम्मति से चुना गया, देश व देशवासियों की सेवा करने के लिए। सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए। अपना काम ठीक से करो। अपना समझ कर करो। जो जिम्मेदारी ली है उसका वहन करो।

राजा नहीं हो तुम, न ही ये राजशाही चल रही है। ख़ुद के लिए ही करो ठीक काम, डरो, डरो, जनता से डरो। अपने से ही डरो भाई।

झूठ का सहारा लेना बंद करो। चुनावी राजनीति बंद करो। मित्रों को फायदा पहुँचाना बंद करो। चुप-चाप अपना काम करो। ठीक से काम करो।

ये हम सब के लिए है। सिर्फ़ हुक़्मरानों के लिए नहीं। एक साथ रहेंगे तो ठीक रहेंगे। अपनों से ही लड़ाई करेंगे तो कोई नहीं बचेगा। और विकास का मतलब नहीं कि सबके पास मारुति कार हो, सबके पास कपड़े धोने की मशीन हो, सबके पास टेलीविजन हो। बात करने का शऊर हो सबके पास, ईमानदारी हो सबके पास, इज़्ज़त से पेश आएँ सब के साथ, सबका ख़्याल हो, बच्चा-बच्ची में फर्क़ न हो, धर्म के नाम पर फूट न हो, सबका अपना निज धर्म हो, सबका इंसानी आदर हो, मार-काट न हो, नस्लभेद न हो, रंगभेद न हो, आर्थिक वर्गीकरण पर आधारित भेद-भाव न हो, समान अवसर मिलें सभी को। यही विकास है। सही मायने का विकास।

और वैसा पुराना ही चलता रहा तो कोई पता नहीं, कभी एक, दो या बहुत से सिरफिरे आएँगे और सब तबाह कर देंगे। सबका अंत साथ ही में होगा फिर।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सच के सिवा कुछ भी नहीं – ‘बड़बोला’ का रोजनामचा – पहिला पोस्ट भारत में गंदगी पर

 

भारतीय खुला पेशाब संस्कृति/The Indian Open Pissing Culture
भारतीय खुला पेशाब संस्कृति/The Indian Open Pissing Culture

नमस्कार मित्रों।

मैं हूँ इक़बाल चौधरी ‘बड़बोला’, हिंदी लेखक, और आज से मैं यहाँ इस ब्लॉग या रोजनामचे में शुरू कर रहा हूँ। उन्हीं चीज़ों पर लिखूंगा जो मुझे सच लगें, मुझे सही प्रतीत हों। चाहे फिर वो राजनैतिक, सामाजिक, अंतर-राष्ट्रीय, साहित्यिक, विचारधारा-संबंधी, निजी, अथवा किसी भी विषय पर हो।

मैंने सन् 2012 में एक उपन्यास दास्तान-ए-का.का.का https://www.facebook.com/Dastan.E.KaKaKa  प्रकाशित किया  व और भी लेखन किया जिसे आप मेरी वेबसाइट http://www.iqbalchoudhary.net पर देख सकते हैं।

आज मैं गंदगी पर बात करूंगा। यहाँ इस देश भारत में जहाँ देखिए लोग पेशाब कर रहे हैं, थूक रहे हैं, पान की पीक लंबी जा रही है, नाक का मैल उंगलियों के द्वारा बाहर निकालकर इधर-उधर मला जाता है, कूड़ा-करकट आम तौर पर फैलाया जाता है, तंबाकू, सुपारी, चिप्स, बर्गर, टिक्की वगैरह खाकर पैकट फेंके जाते हैं, खुले में शौच हो रहा है…

क्या हम इतने मूर्ख हैं कि ज़रा-ज़रा सी बातें हमें समझ नहीं आतीं? ये हमारी सभ्यता की देन है कि हम सफ़ाई नहीं रख पाते? क्या फ़ायदा तरक्की का, समझदार बनने का, और देश को आगे ले जाने के सपने देखने का? कोई कुछ कर रहा है, ऐसा लगता तो नहीं। मोदी सरकार अभियान पर अभियान चला रही है, राज्य सरकारें अपने तरीक़ों से कोशिशें कर रही हैं, जाने-माने चेहरों से कवायद करवायी जा रही है, कुछ प्रभाव पड़ा? क्या सिर्फ़ खाना-पूर्ति हो रही है?

ये बरसों से चला आ रहा है, ध्यान दीजिए। क्या इनके पास ऐसे लोग नहीं जो चीज़ों को ठीक से अंजाम दें… ज़रूर होंगे, पर इनकी नीयत पर शक़ होता है। नीयत और आपकी काबलियत पर। यहाँ लाखों-अरबों रुपये खर्चकर हथियार खरीदे जा रहे हैं, सांसदों व विधान सभा सदस्यों की तनख़्वाहें दुगुनी, तिगुनी की जा रही हैं, रोज़ विदेश के चक्कर लगाए जा रहे हैं , फिर चाहे वो प्रधानमंत्री हों या उनके मंत्रीगण अथवा उच्चाधिकारी… क्या इतने संसाधन नहीं हैं कि ये समस्या जड़ से समाप्त की जाए?

यदि आप किसी को सड़क पर थूकते देखते हैं तो क्या कुछ कह पाने की हिम्मत रखते हैं? जब कोई आदमी खुले में पेशाब कर रहा हो या शौच कर रहा हो तो क्यों नहीं हम कुछ कह पाते?

अगर कोई समझ की बात करें तो लोग अपने ही तर्क-कुतर्क देने शुरू कर देते हैं। उदाहरण कि खुले में शौच करना अच्छा है, गंद बाहर ही रह जाता है और सब कुछ खुले से होता है। खुले में थूक हवा में मिल जाएगी, कूड़ा कहीं नहीं जमेगा।

लाल बत्तियों पर गाड़ियों के दरवाज़े खुलते हैं और लोग ज़मीन पर थूक देते हैं…

चलती गाड़ियों के शीशे खुलते हैं और सस्ती प्लास्टिक की पैंकिंग, केले, सेब के छिलके बाहर फेंक दे जाते हैं…

मेट्रो में लोगों की उंगलियाँ नाक के बीच घुसी रहती है और बाहिर आने पर पैंट या कमीज़ से पोंछ ली जाती हैं…

सरकारी दफ़्तरों में दीवारों के कोनों पर पान की पीकें शोभा दे रही होती हैं और धूल-मिट्टी का तो कोई हिसाब ही नहीं…

मैले-कुचैले, बिना नहाए-धोए लोग काम कर रहे होते हैं, कोई उन्हें नहीं बताता क्या बर्ताव ठीक है?

सड़कों पर हर प्रकार का कूड़ा-करकट देखने को मिल जाता है और बरसों जमी धूल यहाँ से वहाँ बवंडर की तरह…

अच्छे इलाकों, यानि कुछ महँगे इलाकों में कभी-कभी सब कुछ कुछ संजा-सँवरा दिखता है पर निचले इलाकों का क्या हो? वो अपने नहीं हैं क्या, हमारे भारत में नहीं हैं क्या?

अगर मजबूरीवश एक भी गंदा व्यक्ति, घर, सड़क अथवा दफ़्तर भारत में है तो हम सभी गंदे हैं।

मेरी एक बाहिर की दोस्त ने कहा:

“बड़बोला, मेरे लिए हिन्दुस्तान का अर्थ है आम, सामुदायिक जगहों पर टट्टी और पेशाब की बू!”

सच में, थू,थू।

गरीबी का अर्थ ये नहीं कि हम साफ़-सफ़ाई न रखे। और अगर यही अर्थ है तो सरकार व अफसरों को अपनी तनख़्वाहें लेने का कोई अधिकार नहीं। और काम सीख देने से नहीं बनेगा, यहाँ चाहिए निश्चित कदम, साथ में दृढ़ता। मैं करूंगा, और मेरे साथ तुम भी देखो व करो। ये नहीं कि मैं वोटों की राजनीति खेलूंगा, सो तुम चाहे खुले में टट्टी, पेशाब करो या कूड़ा फैलाओ, मुझे तुम भाते हो।

तुम्हें पैसे किस काम के दें अगर तुम हमारा काम ही न कर सको? क्या तुम हमारे माई बाप हो या हम तुम्हारे माई बाप? हम ही हैं तुम्हारे माई बाप, तुम हमारी सेवा में, हमारी सुख-सुविधा में लगो, हम जनता-जनार्दन हैं।

गंदगी की तरफ़ हमारा जो रुख़ है वो ही हमारे समाज की ओर रुख़ बनने लगता जाता है। कामचलाऊ संस्कृति, आचरण में ढीलापन, एक निश्चित व अर्थहीन ढर्रे पर ज़िंदगी को ढोकर चलना, एक यांत्रिक भाव से सब कुछ करना… और अपने-आप को, अपने मन को कुंद करना। नहीं तो ये सब सहनशील नहीं होना चाहिए।बिल्कुल नहीं।

शोर-शराबा करना, भ्रष्ट विचार व बर्ताव दिखाना, छोटों को दबाकर रखना, सबसे इंसानियत से पेश न आना, तूतू-मैंमैं करना, छोटी बातों पर बहसबाज़ी और लड़ाई कर देना… ये सब गंदगी ही है। और ये सब आज के भारतीय समाज में पूर्ण रूप से व्याप्त है। इन सबका संबंध सीधे-सीधे नहीं तो अप्रकट रूप से दिखने वाली गंदगी से ही है।

‘मन मैला तो जग मैला।’

आप ख़ुद ही इसका अंत कर सकने में सक्षम हैं, ऐसा मेरा मानना है। स्वयं को जांचिए, परखें व देखें कहाँ गलती हो रही है व यह बोध आपको इसके पार पहुँचाएगा।

आप गंगा को साफ़ करने की फ़िराक में हैं, मेरे दोस्त आप पहिले गंगा की ओर जाने वाले रास्ते तो ठीक करें! बरसों तक हाइवे बनते रहते हैं, धूल-गर्द-मिट्टी उड़ाते रहते हैं। सड़कों पर चला जाता नहीं, बच्चे सीवर के खड्डों में गिर-गिरकर मरते रहते हैं। स्टेशनों पर बू से बुरा हाल है, चूहे इधर से उधर कवायद करते हैं। रेलगाड़ियों में गंद हर जगह ऐसी चिपका है जैसे गोंद। कोई माँ अपने नन्हे को कुछ दूर पाखाना जाने की बजाय रेलपटरी पर ही करवा रही होती है, कोई मनाही या कोई दंड देते हैं क्या?

सफ़ाई कर्मचारियों से ठीक से काम लेना चाहिए।

काम व्यवस्था का ही है, ये बात स्पष्ट है।

अपना काम कीजिए।